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mere alfaz hi meri pahchana hai
Sakshi Chauhan
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हर रोज लोगों के नजरों के तीर हर रोज उनके नजरीये में खोती हर रोज उनके बातों के शूल मैं खुद याद करके खुद को चुभोती हर रोज खुद की काबिलियत पे शक हर रोज मुसीबतों के भंवर में हूँ होती हर रोज जिश्मों पे नए जख्म हर रोज काटों की सेज पे सोती अगर मैं हार जाऊं तो मुझे कायर न बताना, मेरे हिस्से की थोड़ी से महोबत जाताना! ❤ ©Sakshi Chauhan
22 Love
कई रात गुजारी है इस अँधेरे में तुम थोड़ा सा नूर ले आओगे मेरे तकिये गीले हैं आंसुओं से तुम मुझे अपनी गोद में सुलाओगे सुना है बाग़ है तुम्हारे आंगन में मेरे लहसल बचपन को वो झूला दिखाओगे मैने खोया है अपनी हर प्यारी चीज को में अपनी किश्मत फिर भी आजमाऊँगी एक शायरी लिखी है मैंने उन्हीं कभी मिलोगे तो सुनाऊँगी ✒@munawar Faruqui ©Sakshi Chauhan
14 Love
ग़ज़ल/غزل जो तू नहीं है तो फिर मौत ही लिपट जाए किसी भी तरह तो ये सर्द रात कट जाए उसे कहो मैं मुहब्बत से तंग आ गया हूं उसे कहो कि मेरे रास्ते से हट जाए तेरे बदन को किसी का भी हाथ छू ले अगर मैं चाहता हूं किसी हादसे में कट जाए भरे हुए हैं मेरे दिल में इतने गम शीराज़ मैं मुस्कुराऊं नहीं तो ये सीना फट जाए ✍शीराज़ ख़ान शीराज़/شیراز خان شیراز ©Sakshi Chauhan
16 Love
इस रोशन शहर में एक कोना ढूंढो मुझे रोना है एक माँ की गोद सा बिस्तर ढूंढो मुझे सोना है ©Sakshi Chauhan
18 Love
इतनी खूबसूरती भी बेवजह है शायद जो कोई सोचे वो आपके काबिल नहीं ©Sakshi Chauhan
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