White छोड़ें घर ,बढ़ी उमर, अब हमें कमाने जाना है।
फूल से बचपन को अपने खंडहर बनवाने जाना है।
छोड़ें घर ,बढ़ी उमर, अब हमें कमाने जाना है।।
छत से टपके बूंद और ढेहरी खाली खड़ी हुई है,
शादी की करनी तैयारी बहनें मेरी बड़ी हुई हैं।
बापू की बढ़ती सांसें बिन बोले ही सब कहती हैं,
कड़क ठंड में फटी हुुई धोती में अम्मा जब रहती हैं।
उन्हीं सिकुड़ती खालों पर अचकन डलवाने जाना है,
छोड़ें घर ,बढ़ी उमर, अब हमें कमाने जाना है।।
गांवों के संगी साथी यारों की दुनिया छूट गयी,
भरी लालिमा से दादी की दूध की मटकी फूट गयी।
छोटी सी बहना मेरी किससे लड़कर सोती होगी,
राह देखकर जानें कितनें कितनें घंटे रोती होगी।
उसके छोटे हांथों को, कंगन दिलवाने जाना है,
छोड़ें घर ,बढ़ी उमर, अब हमें कमाने जाना है।।
©शुभम मिश्र बेलौरा
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