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स्वतंत्र स्वच्छंद विचारक। अल्हड़ यायावर लेखक । 1-लोकतंत्र की हार 2-मनमौजियाँ 3-मनमर्ज़ियाँ
White पिवत राम रस चढ़ी खुमारी तब जानी दुनियाँ हैं उधारी जंग तब किसके लिए हैं सारी क्यो इतनी रंजिश इतनी व्याधि राम चदरिया तन ओढ़ के सर चंदन तिलक लगाय राम नाम जपते फिरे, मन में बहु घात छुपाय राम नाम का जाप कर ले मन में छोड़ कर जग का ध्यान, बन में मुक्ति मोक्ष तेरे दर आएगी देखना जग बदला बदला सा लगेगा पल में । ©बिमल तिवारी “आत्मबोध”
बिमल तिवारी “आत्मबोध”
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"सभी को सभी के खुशियों का सहारा मुबारक गुलों का चमन और रंगों का बहारा मुबारक" ©बिमल तिवारी “आत्मबोध”
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माह दिसंबर बदन में जगने लगे है सिहूरन कुछ बर्फीली हवाओं से लगने लगे हैं ठिठुरन कुछ धीरे धीरे बदन पर चढने लगा है वसन का तह जेसे जालिम आज़ादी से होने लगे हैं बिछुड़न कुछ धीरे धीरे चढ़ी दुपहरी जैसे रात अमावस की बादल का ओंट लिए सूरज चांद लगे है पूरनम कुछ गुलाबी होठों पे तेरे चमकीली ईक ओंस की बूँद जैसे मेरे ख्वाबों वाली तू लगे हैं सिमरन कुछ कंबल ओढ़ रजाई में जमी जवानी बूढ़ों सी सन सन बर्फ़ीली सांसे लगे फ़राओ मिसरन कुछ ।। ©बिमल तिवारी “आत्मबोध”
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