संस्कृत का बहुत प्रसिद्ध लघु सूत्र है "अति सर्वत्र वर्जयेत्" माने अति करने से हमेशा बचना चाहिए, अति का परिणाम हमेशा हानिकारक होता है, और आज ये सूक्ति पूरी दुनिया पर चरितार्थ होती है। आगे बढ़ने की सनक में क्या-क्या नहीं दाँव पर लगाए हैं,, प्रकृति के साथ क्रूर व्यवहार, बेजा फ़ायदा आज हम इंसान को ऐसे मोड़ पे ला दिया है; जहां अपनी ही ज़िंदगी की भीख मांगनी पड़ रही है। परिणाम आज दुनियाँ के सामने है, मसलन एक अदद अदृश्य-सी कोरोना को ही देखिए, पूरी दुनिया इसके सामने घुटने टेक दिया है, जहाँ ज़िंदगी और मौत के बीच पलक झपकने की भर की दूरी है, ये एक ऐसी लड़ाई है जिसे हम सब गोला, बारूद, हथियार से नहीं बल्कि डॉक्टर, अस्पताल, दवा सहानुभूति दुआ से जीतेंगे, खैर हम इंसान अगर समय रहते ना चेते तो आगे भी भुगतते रहेंगे. वास्तव में अति किसी भी चीज की अच्छी नही होती,, हम इंसान तरक़्क़ी के नाम पर भले ही छिछली दावे करें, महल अटारी गगनचुम्बी इमारतें खड़ाकर गुमान करें, लेकिन कुदरत का विकल्प कभी नहीं बसा पाएंगे.. वर्तमान को देखिये...भयभीत होइये आने वाले कल से, आख़िर कुदरत को ललकारते हम कहां आ पहुंचें हैं..... दमघोंटू आबोहवा, झुलसाती गर्मी, बेमौसम बारिश आख़िर हम सब क्या-क्या नहीं तरक्की को समर्पित करेंगे,, खैर कहर ढाती कोरोना जाते-जाते क्या सबक सिखाएगी ये समय बताएगा....प्रकृति से हम हैं, हमसे प्रकृति नहीं!🌱🍃👌👏
Right sir ji 👌 👌 👌