हमें प्रेम में रहने दो।
प्रश्न अनेक उठेंगे अब हमारे प्रेम पर,
गर्जन तुम्हारी मौनता की आक्रामक थी।
काले मेघ बरस रहे, अभी और बरसेंगे।
मेरी चपलता, तुम्हारी मौनता में विलीन थी।
ये संचित प्रेम, प्रवाह से कब जल-प्रपात बना?
कब दुविधाओं ने तुम्हें मुक्त किया?
कैसे साहस ने तुम्हारा आलिंगन किया?
ये मौनता का बाँध कैसे तुमने तोड़ लिया?
मैं मानती रही अभागा स्वयं को।
मेरी प्रतीक्षा का अंत न था।
मैंने स्वीकारा - मैं सीता न थी।
मैं दासी तुम्हारी, मैं मात्र मीरा।
चक्रव्यूह अति जटिल है अब भी
जाति का, धर्म का, कुल का, गोत्र का।
तुममें-मुझमें, क्या सामर्थ्य है इसे तोड़ने का?
चक्रव्यूह अति जटिल है अब भी
दर्प में लिप्त नीति का, आडंबर में लिप्त समाज का।
तुममें-मुझमें, क्या सामर्थ्य है इसे तोड़ने का?
मैं निश्चिन्त हूं अब कि तुमने स्वीकारा मुझे।
मैं निश्चिन्त हूं अब कि ये प्रेम कुंचित मर्म नहीं।
मुझे इस क्षण हर्ष में जीने दो।
मेरा ईश्वर भी जनता है - निस्वार्थ प्रेम का कोई अंत नहीं।
तुम्हारी मौनता ने सिद्ध किया - प्रेम का स्वरूप केवल विवाह नहीं।
तुम्हारी गर्जन ने सिद्ध किया - प्रेम में कोई भेद नहीं।
निवेदन! इस समाज से। प्रार्थना! प्रत्येक नीति से।
हमें मौन रहने दो। कोई प्रश्न ना करो।
सब स्पष्ट है। अब केवल हमें प्रेम में रहने दो। (गीतिका चलाल)
@geetikachalal04
©Geetika Chalal
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