White नारी को जिसने समझ लिया देवत्व उसे ही मिल पाता है
वन, उपवन, घन, पवन, सुमन, सुगंध संतुष्ट नहीं करते,
विक्षिप्त रहता हूँ गंधमादन भी किंचित संतुष्ट नहीं करते।
तेरे गेसुओं के साए, मृगनयनों की मस्ती में डूबा जब से,
बादलों के साए, सागर की गहराई उर संतुष्ट नहीं करते।
तूने मुझे उकसाया था तेरी गुलाबी कलियाँ चूम लेने को,
उनके बाद अन्य संदली अहसास अब संतुष्ट नहीं करते।
तेरे होंठों के मदिर प्याले जब से हुए थे मयस्सर मुझको,
मदिरालय में साकी के जाम मुझे अब संतुष्ट नहीं करते।
एक बंद किताब थी तुम तुमको पढ़ कर मैंने ये था जाना,
वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण भी क्यों तुष्ट नहीं करते।
उन गहराईयों और उत्तुंग शिखरों को पाकर मैंने समझा,
नारी को यदि पूर्णतः पाया ईश्वर भी क्यों तुष्ट नहीं करते।
आत्मा से आत्मा का विकास रूप उस सत्य चिरंतन का,
रूह से रूह मिलती है तो तन सौष्ठव भी तुष्ट नहीं करते।
नारी को जिसने समझ लिया देवत्व उसे ही मिल पाता है,
तुम सा सृष्टा हो पास तो सृष्टि रचियता संतुष्ट नहीं करते।
©Rahul Shukla
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