"भूख - एक सत्य घटना"
एक मासूम मिला मुझे,
जो था भूख से लाचार ।
कच्चा, पक्का या हो जला,
सब भोजन था उसको स्वीकार ।
मीठा,खट्टा या हो फीका,
भेद करना नहीं आता था ।
क्षुधा करे जो शांत उसकी,
वहीं निवाला उसे भाता था ।
हाथ में जो थी रोटी मीठी,
मैंने उसकी तरफ़ थी बड़ाई ।
झपट हाथ से मेरे उसने,
बड़े चाव से थी खाई ।
आँखों में आंसू मेरे,
दिल पर आघात रहा ।
उसका भूखा चेहरा मुझको,
दिनभर था याद रहा ।
जो हो क्षमता तुम में,
तो स्वयं के साथ दूसरों को खिलाए ।
पाप-पुण्य का हिसाब छोड़कर,
बस इंसानियत का फ़र्ज़ निभाए ।
- पंकज जैन
©poet pankaj jain
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