आज उसके जनाजे पे
सब परेशान...
पश्चाताप भी हुआ बड़ा
करते रहे शिकायत
क्यों किसीने ना सुने
दर्द उसके......
कुछ तो शिकायत
होगी तुमसे,हमसे
यां जिंदगी से उसके.....
सब परेशान.....
जनाजा उठ चुका था
शरीर राख हो गया था
और स्मशान भी खामोश हो गया था
और फिर सबके अश्क़ सूखने लगे थे
एक नया सवेरा आ चुका था
सबके होंठो पे एक मुस्कुराहट लिए....
अब सब उस वाकिये को भूल चुके थे ।
यह किस्सा न तो पहली
ना आखरी....
यह सिलसिला ऐसी ही चलती चली जाएगी
और हम....
इसी तरह
चंद लम्हों के गम लिए
खामोश होठो के साथ
फिर किसीके, जनाजे में
अश्क़ बहाने निकल पड़े होंगे...
और हमेशा की तरह
किसी कवि की कविता में
किसी पत्रकार के पत्रिका में
वह एक किस्सा बनके , खो गया होगा....।
स्निग्धा नायक,कोटा, राजस्थान ।।
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