तमाम बातों के साथ एक महत्वपूर्ण चुनौती, अपने अस्तित्व की है, जिसमें प्रथम हमारा 'नाम' होता है।बड़े आश्चर्य की बात है कि तमाम क्रांतियों के बीच इस 'नाम' को बचाए रखने की बात हम भूल चुके हैं।यह सब आँखों देखा हाल साझा कर रही हूँ।स्त्रियों के कई सारे उपनाम दिए जाते हैं, उन्हें पुकारने के लिए।इसी बीच उनका अपना नाम खो जाता है और समय के साथ उनकी असली पहचान हम भूल जाते हैं।अक्सर उनके नैहर के नाम से पुकारा जाता है, या तो उपनामों से, या तो पति, बेटे या फलाने खानदान की बहू के नाम से।
गाँवों में देखे अगर तो -मगह की है तो मघानो, भोजपुर की हैं तो- भोजपुरन, देवकुड़ की हुई तो देवकुड़िया और न जाने कितने सारे।
वहीं शहरों में हम विकसित तो हुए हैं लेकिन 'नामों' का बच पाना वहाँ भी मुश्किल होता दिखाई पड़ता है।आज भी कई लोग Mrs....... के नाम से ही जानी जाती हैं।
सब कुछ बचाने से पहले न इस नाम को बचाना ज़रूरी है।'नाम' जो जन्म से ही हमारा अस्तित्व है।पुकारिए न उन्हें जिस नाम से पुकारना है।पर यह भी देखिए कि कहीं उनकी असली पहचान न खो जाए।लोग उनका नाम ही न भूल जाएँ।
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©Meenakshi Raje
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